सोमवार, 2 सितंबर 2013

मेरे देश में ..........
 संस्कृति का धनि था ,जगत का गुरु था।
स्वर्ण चिड़िया चैहकती थी मेरे देश में।
पूजी जाती थी धरती  ,पहाड़ और नदी,
सम्मान पाती थी नारी कभी मेरे देश में।
धनं-अन्न से भरा था ,कही न कोई गम था,
इन्साफ पता था इंसान,कभी मेरे देश में।
आज उजड़ी है धरती ,नदियाँ है मैली,
खुदे रोते है पर्वत मेरे देश में।
नर बहेशी हुआ ,मन पापी हुआ,
आज नारी असुरक्षित मेरे देश में।
सब्जी मेहेंगी यहाँ ,अन्न मेहेंगा हुआ,
तेज़ाब सस्ता बड़ा है मेरे देश में।
ज़िन्दगी की यहाँ कोई कीमत नहीं ,
आज मौत है सस्ती मेरे देश में।
आज जनता के दुःख सुख से है बेखबर,
सत्ता कुर्सी के पुजारी मेरे देश में।
आज आजायें गर शहीद आजादी के ,
क्या न रोयेंगे इस हालत पे मेरे देश में।

3 टिप्‍पणियां:

Neeraj Neer ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है आपने .. आज तो भगवान भी आ जाये तो रोयेंगे आकर अपने देश में ..

Dr. Shorya ने कहा…

सही कहा आपने, बहुत बुरा हाल है

Satish Saxena ने कहा…

सच है ..