बुधवार, 18 सितंबर 2013

गुरुत्व का कर्त्तव्य 
प्रांगण में गुरु की कृपा के ,
विकास पाते है शिष्य रुपी पोधे
उन अनुभवी हथों से माली के ,
सुरक्षित देख भाल वे प्यार के सहारे
ये अंकुरित होते वे जाते है सवाँरे
ये रिश्ता होता बड़ा अटूट और निराला
बिना किसी सम्बन्ध के भावनाओं से पाला
विशवास पर टिका ये नहीं कोई समझोता
अपनत्व से  भरा ये नहीं कोई औपचारिकता
शिल्पकार बन कभी गुरु गढ़ता है उनको
हथोडी की चोट सम दंड देता है उनको
विकार सब दूर करने को
जीवन पथ के लिए तैयार करने को
कभी आँखे दिखता कोप कर
कभी मधुर स्पर्श देता प्यार कर
बिना किसी स्वार्थ के इनका वेह हितचिंतक
आगे बढ़ता इन्हें सन मार्ग पर
हमारी भाषा हिंदी 
हिंदी है हमारी
संवेंदनाऊँ से बंधी न्यारी
हृदय की अभिव्यक्ति का स्त्रोत
भारतियों की नैनो की ज्योत
जब अपनी भाषा में हम
अपनों से सुख दुःख है बांटते हम
इसका अपनत्व ही कर देता है कुछ दुःख कम
वक्त के मनसा हो जाता है श्रोता का मन
अपनी भाषा का अनुभव
ममत्व भरे आँचल सा निर्मल
अन्य भाषाएं जरूर
मगर अपनी भाषा से रहे न दूर
माँ की लोरी की मिठास रहेती है इसमें
पिता का दुलार स्नेह भरता है बालमन में
भाई बेहेन के मीठी झड़प
दोस्तों की बेताकलोफ्फ़ बहस
मिठास घोलती है अपनी भाषा में
सह्रदयता है उपजती अपनत्व की धुप खिलती
अनुभूतियों का आदान प्रदान
कर देता है समस्त ग्रंथियों का निदान
एक दिल की आवाज़ दुसरे की बन जाती
अपनी भाषा में कही बात सब की बन जाती
जड़ों से गर जुड़े रहे तो शक्तिमान बनेगे
एकता के सूत्र में बंधे कुश्हाल बनेगे
एक दिन जीत जाता है तूफ़ान से जड़ों से जुदा पोधा
भाषा संस्कृति से जुड़े देश का नहीं कर सकता कोई सौदा

सोमवार, 2 सितंबर 2013

मेरे देश में ..........
 संस्कृति का धनि था ,जगत का गुरु था।
स्वर्ण चिड़िया चैहकती थी मेरे देश में।
पूजी जाती थी धरती  ,पहाड़ और नदी,
सम्मान पाती थी नारी कभी मेरे देश में।
धनं-अन्न से भरा था ,कही न कोई गम था,
इन्साफ पता था इंसान,कभी मेरे देश में।
आज उजड़ी है धरती ,नदियाँ है मैली,
खुदे रोते है पर्वत मेरे देश में।
नर बहेशी हुआ ,मन पापी हुआ,
आज नारी असुरक्षित मेरे देश में।
सब्जी मेहेंगी यहाँ ,अन्न मेहेंगा हुआ,
तेज़ाब सस्ता बड़ा है मेरे देश में।
ज़िन्दगी की यहाँ कोई कीमत नहीं ,
आज मौत है सस्ती मेरे देश में।
आज जनता के दुःख सुख से है बेखबर,
सत्ता कुर्सी के पुजारी मेरे देश में।
आज आजायें गर शहीद आजादी के ,
क्या न रोयेंगे इस हालत पे मेरे देश में।

रविवार, 1 सितंबर 2013

केदार का सन्देश                                                                                                                                                              केदारनाथ बाबा क्यूँ रुष्ट हो गए ,अपने भक्तो को क्यूँ जख्म दे गए।
प्रलये के बादलो को क्यूँ तब ही बरसना था ,भक्तो को क्यूँ इतना कथोर्दंड देना था।
प्रलायेकारी नेत्र  खोलने का यही समय पाया ,अपनी पवित्र देश भूमि लाशों का ढेर लगाया
आहत हुए कितने बेक़सूर ,बूढ़े जवान बच्चे,क्यूँ तुम्हे दया नहीं आई सब देख और समझके।
कहते है तुम्हारे दर से झोलियाँ भारती है ,बिन करे ही भक्तों की तकदीरे सवरती है।
आज किस अपराध की सजा दे डाली ,इन मासूमों की ज़िन्दगी नर्क बना डाली।
दुनिया में जो पाप कर रंगरलियाँ मनाते है ,दूसरो के खून से चिराग जलाते है।
क्यूँ तुम्हारी तिरछी नज़र उन पर नहीं पड़ी ,क्यूँ उनकी काली करतूत तुमसे रही छूपी।
अगर मिटाना ही था ओ तो इस भ्रस्ताचार को मिटाते ,गरीबों की पेट की भूख को मिटाते।
इतना सुन बाबा ने नैना खोले ,और आँखों में आसूँ भर कर इंतना ही वो बोले।
चाहता तो यही था दुष्टों को नष्ट करता ,जिस विमान में वो होते उसी को नष्ट करता।
लेकिन सोचता हूँ की इन घटनायों से इंसान सीखे ,दुःख की घडी में एक हो ,ब्राह्त्री भाओं सीखे।
एक दुसरे के दर्द को अपना दर्द बना ले ,दुसरो की मदद को खुद को हाज़िर कर दे।
ये जख्म तो भर जायेंगे ,फिर से चमन में फूल खिल जायेंगे।
गर मन की मैल मिट गयी ,तो घट मे ही केदार दर्शन हो जायेंगे।